कारखानों की रफ्तार बढ़ी, पर दुनिया की आग से महंगाई भी बढ़ी 

अप्रैल का मैन्युफैक्चरिंग PMI समझिए आसान भाषा में

सोचिए कि किसी देश के कारखानों का मूड जानना हो कितना माल बन रहा है, कितने ऑर्डर आ रहे हैं, कितने लोगों को नौकरी मिली तो इन सबका एक नंबर में जवाब देता है PMI यानी Purchasing Managers' Index। अगर यह नंबर 50 से ऊपर है, तो मतलब कारखाने चल रहे हैं, काम बढ़ रहा है। अगर 50 से नीचे आ जाए, तो समझिए उद्योग सिकुड़ रहा है। इसलिए जब भी PMI 50 के पार हो, अर्थशास्त्री राहत की सांस लेते हैं। अप्रैल 2026 में भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI 54.7 पर आया। मार्च में यह 53.9 था। यानी थोड़ा सुधार हुआ। लेकिन असली कहानी सिर्फ इन दो नंबरों में नहीं है।
बढ़ा तो सही, पर इतनी धीमी रफ्तार क्यों?
54.7 सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन HSBC और S&P Global की रिपोर्ट कहती है कि यह पिछले करीब चार साल की दूसरी सबसे धीमी ग्रोथ है। मतलब? कारखाने चल तो रहे हैं, पर उस जोश से नहीं जैसा पहले चलते थे। नए ऑर्डर आए, उत्पादन बढ़ा लेकिन दोनों की रफ्तार साढ़े तीन साल के सबसे निचले स्तरों में से एक रही। कंपनियों ने बताया कि ग्राहक फैसले लेने में देरी कर रहे हैं, बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, और दुनिया में जो चल रहा है वो भी असर डाल रहा है। उस "दुनिया में जो चल रहा है" की बात अगले हिस्से में करते हैं।
मिडिल ईस्ट की आग, भारत के कारखानों तक कैसे पहुंची?
यह थोड़ा अजीब लग सकता है मध्य-पूर्व में युद्ध और उसका असर यहां जयपुर, पुणे या लुधियाना के किसी कारखाने पर? लेकिन ऐसा ही हुआ। मिडिल ईस्ट संघर्ष की वजह से समुद्री रास्ते बाधित हैं। तेल की कीमतें ऊपर हैं। इससे fuel महंगा हुआ। Fuel महंगा होते ही aluminium, chemicals, rubber और petroleum products सब के दाम चढ़ गए। यह सब कच्चा माल है जो कारखानों को चाहिए। नतीजा? अप्रैल में कच्चे माल की लागत 44 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। मतलब पिछले करीब चार साल में इतनी महंगी कभी नहीं रही थी। HSBC की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि मिडिल ईस्ट संघर्ष के असर अब सीधे आंकड़ों में दिखने लगे हैं। Grant Thornton के विशेषज्ञ ऋषि शाह ने तो यहां तक कह दिया "वेस्ट एशिया का संघर्ष अब दूर का खतरा नहीं रहा, यह हमारे आर्थिक आंकड़ों में सीधे दिख रहा है।"
महंगाई की मार कंपनियों ने बोझ आप पर डाला
जब कारखाने को कच्चा माल महंगा मिलेगा, तो वो उस बोझ को कहां डालेगा? जाहिर है आप पर, यानी ग्राहक पर। अप्रैल में कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतें छह महीने की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ाईं। और कुल मिलाकर महंगाई अगस्त 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। Consumer goods यानी रोजमर्रा की चीजें इस सेक्टर में लागत की बढ़त थोड़ी धीमी रही दूसरों के मुकाबले। लेकिन फिर भी यही सेक्टर सबसे ज्यादा महंगाई में नंबर एक रहा। मतलब जो चीजें आप हर दिन खरीदते हैं, उन्हीं पर सबसे ज्यादा असर पड़ा।
अच्छी खबरें भी हैं Exports और Jobs में जान आई
अब थोड़ी राहत की बात। Exports यानी निर्यात का मोर्चा बहुत मजबूत रहा। अप्रैल में नए export orders सात महीने की सबसे तेज रफ्तार से बढ़े। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान, चीन, सऊदी अरब, UAE, UK और केन्या इन सभी देशों से भारतीय माल की मांग बढ़ी। यह बताता है कि दुनिया में भारतीय उत्पादों की साख है। नौकरियों के मोर्चे पर भी खुशखबरी रही। कारखानों में hiring दस महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची। नए काम के बैकलॉग ज्यादा नहीं थे, फिर भी कंपनियों ने लोगों को काम पर रखा क्योंकि उनके पास भविष्य के विस्तार की योजनाएं हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। हां, inventory यानी कच्चे माल का भंडार करीब पांच साल की सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ा। कंपनियां ज्यादा स्टॉक नहीं रख रहीं क्योंकि बिक्री की रफ्तार उतनी तेज नहीं है। यह सतर्कता की निशानी है।
तो आगे क्या? भरोसा है, पर सवाल भी हैं
कारोबारी माहौल को लेकर कंपनियों का भरोसा अभी भी मजबूत है नवंबर 2024 के बाद दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर। कंपनियों को उम्मीद है कि उनकी marketing काम करेगी, लंबित प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलेगी, और demand धीरे-धीरे पटरी पर आएगी। लेकिन चुनौतियां असली हैं। तेल की कीमतें अगर ऊंची रहीं, महंगाई बढ़ती रही, और RBI के पास ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश कम रही तो आने वाले महीने परीक्षा लेंगे। भारत के कारखाने चल रहे हैं, टिके हुए हैं यह सच है। पर एक हाथ में ऑर्डर की उम्मीद है और दूसरे हाथ में महंगाई का बोझ। यही अभी की असली तस्वीर है।